मुरिया जनजाति में तत्वदृष्टि एवं जीवनदृष्टि: दार्शनिक आयाम

 

Dr. Nister Kujur

 

Associate Professor, School of Studies in Sociology, Pt. Ravishankar Shukla University, Raipur (C.G.)- 492010.

*Corresponding Author E-mail: Nister.kujur@yahoo.com

 

 

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जनजाति जीवन शैली में तत्वदृष्टि और जीवनदृष्टि का गहरा संबंध है सामान्यतः जनजाति जीवन विवि के जो तत्व दिखायी पड़ता है वह जीवन दृष्टि है और यह जीवन दृष्टि तत्वदृष्टि दिशानिर्देशित होता है दूसरे शब्दों में कहें तो जनजातीय जीवन शैली तत्वदृष्टि का ही प्रकटीकरण है। जनजातीय समुदाय में कई सांस्कृति प्रतिमान एवं मान्यताएं है जिसके आधार पर जनजातीय समुदाय के रहन-सहन, खान-पान, तीज-त्यौहार, खेती कार्य सांस्कृतिक गतिविधियां आदि क्रिया कर्म में आज भी तत्व दृष्टि प्रासंगिक बना हुआ है। किन्तु आधुनिक बेतहासा औद्योगिकीकरण एवं वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने जनजातीय तत्व दृष्टि को बाधित किया है

 

ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू डनतपं ज्तपइेए  म्जीवे ंदक म्पकवेण्

 

 

 

 

प्रस्तावनाः-

सामान्यतः जनजातीय जीवन शैली के संबंध में यहां यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इनका जीवन सांस्कृति से प्रारंभ एवं समाप्त होती है। जनजातियों के जीवन विभिन्न मान्यताओं एवं मूल्यों से निर्देशित होती है इनका जीवन पारंपरिक सांस्कृतिक, मान्यताओं एवं मूल्यों पर आधारित है जैसे - फसल मिजांई के पश्चात पैरा को मचाना में चड़ाना जिससे बाहरी चारा घटने पर घरेलु पशुओं को चारा उपलब्ध

 

 

 

कराया जा सके। इसी प्रकार जनजातियों के खेती कार्य, तीज-त्यौहार, जन्म, विवाह, मृत्यु, बीमारी की उपचार, मकान निर्माण आदि इन सभी  कार्यो को करने के एक निश्चित तौर तरिके है इसका संबंध तत्वदृष्टि से है और जीवन में जो दिखायी देता है वह जीवन दृष्टि है। वास्तव में जनजातीय तत्वदृष्टि का ही प्रकटीकरण है मूल में तो तत्वदृष्टि द्वारा दिशा-निर्देशिन है जिसके आधार पर जनजाति सक्रीय या गतिमान होता है जैसे मुरिया जनजाति में मृत दफन स्थल में पत्थलगड़ी करके उसके नाम जन्म मृत्यु तिथि गोत्र आदि उकेरना के पीछे मान्यताएं है। उदाहरण के लिए विवाह संबंध जोड़ने के लिए गए कूटुंब को पूछना नहीं पड़ता की लड़के पक्ष से लाया गया रिस्ता पसंद आया अथवा नहीं इस बात की सूचना वहां घटित गतिविधि से पता चल जाता है और वह यह है कि लड़का पक्ष से लाया गया महुआ या ताड़ी का शराब को यदि कन्या पक्ष के माता-पिता नजदिकी नातेदार पी रहे है या स्वीकार कर रहे है तो यह एक तरह को घोषणा के समान होता और मान लिया जाता है कि रिस्ता पसंद है। इसी प्रकार सभी क्रिया कलापों के पीछे  तौर-तरिकों से बाहरी समुदाय को कोई फर्क नहीं पड़ता किन्तु एक निश्चित तरिके से ही कार्य विशेष को करना ये तत्वदृष्टि है तथा कोई कार्य पूर्ण रूप में दिखयी पड़ता है वह जीवन दृष्टि है अर्थात कार्य के रूप में तत्वदृष्टि का प्रगटिकरण ही जीवनदृष्टि है। तत्वदृष्टि इन्हें आधुनिकता एवं बाहरी दुनिया से दूरी बनाएं रखने में मदद करती है और अपने समुदाय के बीच संबंधों की मजबुति कों बनाए रखती है हलांकि वर्तमान में कुछ चीजें परिवर्तित हो रही है किन्तु आज भी कुछ क्रियाकलाप यथावत बनी हुई है क्रोबर ने संस्कृति के दो पलीुओं की चर्चा की है जिसे तत्व दृष्टि ;म्पकवेद्ध तथा जीवन दृष्टि  ;म्जीवेद्ध कहते है।  तत्वदृष्टि वास्तव में जनजाति संस्कृति का प्रकटीकरण है जिसमें उसके गुण तथा उससे जुड़ी विचारधारापएं समाहित है तत्वदृष्टि जनजातियों में ठीक उसी तरह विद्यमान है जिस प्रकार दुर्खीम (1912) के अपने में धर्म की उत्पति जनजाति समाज से मानते है उनका तर्क यह था कि अस्ट्रेलिया अरूनण्टा जनजाति में पवित्रता की धारणा पनपने का अधार टोटॅमवाद पाया गया तथा उनमें टोटॅम के आधार पर ही पवित्र और साधारण वस्तुओं में भेद करने की भावना का जन्म हुआ और जो वस्तुएं पवित्र है उस वस्तु के प्रति उनमें आदर एवं श्रद्वा की भावना देखा गया अथार्त ऐसे वस्तु को किसी भी स्थिति में हानी नहीं पहुंचाया जा सकता अतः टोटॅम ही समस्त धर्मो का प्राथमिक स्तर है, क्योंकि टोटॅमवाद नैतिक कत्र्तव्यों और मौलिक विश्वासों की वह संगठन है, जिसके द्वारा समाज और पशु, पौधे या अन्य प्राकृतिक वस्तुओं के बीच पवित्र और अलौकिक संबध होता है। जो जीवन के विभिन्न घटनाओं को समझने में दार्शनिक दृष्टिकोण प्रदान करता है। जैसे कि पहाड़ी कोरवा जनजाति उत्पति में उन्हीं के पुराण में कहा गया है कि फसल के सुरक्षा के लिए बनाई गई मानव पुतला जीवित मनुष्य बना और तीर कमान लेकर खड़ा हो गया और जंगल में रहने के कारण कोरवा शब्द उत्पति हुई और आगे चलकर कोरवा कहलाये। इस प्रकार सभी जनजातियां अपनी उत्पति के बारे में अपनी स्वयं की व्याख्या प्रस्तुत करता है

बस्तर के मुरिया जनजाति आज भी अपनी सांस्कृतिक मूल्यों को (कुछ को छोड़कर ) सुरक्षित संग्रहित  रखने में कामयाब रही है यह महिलाओं के पहनावे, बाल बनाने के तरिके, कृषि कार्य, तीज त्यौहार मनाने के ढ़ग, विवाह के पारम्परिक विधियां, जन्म, मृत्यु, इत्यादि कई अवसारो में इनकी वास्तविक जीवन शैजी और तत्वदृष्टि से संचालित एवं क्रियान्वित  होता है। जैसे - मिंजाई के पूर्व एक तत्वदृष्टि है जिसके अनुसार मिंजाई के पूर्व खलिहान में मुर्गी का अण्डा रखा जाता है जो अंतिम मिंजाई तक खलिहान में ही बना रहता है। खलिहान में अण्डा देखकर यह अनुमान जगाया जाता है इनका मिंजाई कार्य या तो प्रारम्भ हो गई या होने पर है। इसी प्रकार प्रसव साघ्रता से बीना रूकावट के हो इसके लिए गर्भवती महिला के कमर में जड़ी बांधा जाता है जिससे सुरक्षित प्रसव होती है। मेलिनोवस्की (1948 रू डंहपबए ैबपमदबम ंदक त्मसपहपवद ंदक वजीमत म्ेेंल) ने अपने अध्ययन में संस्कृति की व्याख्या एक औजार (डमबींदपेउ) के रूप में की है जिसके सहयोग से व्यक्ति एवं व्यक्तियों का समूह संकट से निकलता है एवं अपनी आवश्यकता की पूर्ति करता है। किन्तु पिछले चालीस-पचास दसकों में जनजातीय क्षेत्र में औद्योगिकीकरण और बाहरी लोगों का बेतहासा घुसपैठ ने इनके तत्वदृष्टि को कमजोर किया है और जनजातियों के जीवन शैली में कई प्रकार के समस्याए बड़ी है सच्चिदानंद एवं वी.वी. मण्डल (1985) ने अपने पुस्तकइडस्ट्रीलाइज़ेशन एण्ड सोशल डिसआॅर्गानाजे़शन: स्टडी आॅफ ट्राइब्लस बिहारमें लिखा है कि जनजाति क्षेत्रों में हो रहे आंदोलन, हिंसा, पलायन, बढ़ते अपराध, बढ़ती ऋणग्रस्तता, मानव तस्करी इत्यादि इसी विचारधारा, सोंच एवं व्यवहार के क्षेत्र में फैलने का कारण बताया है।

 

मुरिया जनजाति:

मुरिया जनजाति अपने को रसेंल एंव हीरालाल (1916)1 के अनुसारमूर शब्द से मुरिया बना है मूर का अर्थ पलाश वृक्ष है बस्तर रियासत मे पलाश वृक्ष की बाहुलता रही है अतः इस वृक्ष की छाया मे रहने के कारण मुरिया कहलाए मुरिया जनजाति मे कुल तीन प्रकार के मुरिये पाए जाते है - राजा मुरिया, घोटुल मुरिया और झोरिया मुरिया। राजा मुरिया जो हल्बी परिवेश मंे है वो अधिकतर जगदलपुर मंे बसे है जबकि गोड़ी परिवेश में घोटुल मुरिये और झोरिया मुरिये नारायणपुर, कोड़ागाँव, दन्तेवाड़ा जिले में बसे हुए है झोरिया मुरिये घोटुल मुरिये मंे विलीन हो चुके है।2 मुरिया जनजाति गोड़ जनजाति समूह का एक उप समूह है जिसके रिज़ले ( 1891 )3 के अपने इसके जीन उप समूह का उल्लेख किया है डोकर गोड़, जोरा गोड़ एवं राज गोड़ प्रमुख है।  जाबकि क्रुक्स (1896 )4 में 13 उप समूहा का उल्लेख किया है तथा आपके अध्ययन में छः गोत्र समूह का वर्णन मिलता है जिसे छगबा, देवार, कोराम, मरकाम, पोसम एवं सोहम प्रमुख है। मोहन्ती (2004)5 में गोड़  जनजाति को द्रविड़ीयन परिवार का प्रमुख जनजाति बतलाया है जो देश की वन क्षेत्रों में निवास करती है।

 

अध्ययन का उद्वेश्य:

 शोध अध्ययन के निम्न उद्वेश्य है -

1.         मुरिया जनजाति लोगों में उन तत्वदृष्टि तत्वों को ज्ञात करना जिससे वह निर्देशित होता है।

2.         मुरिया जनजाति के दैनिक जीवनदृष्टि के क्रियाकलापों को ज्ञात करना।

 

अध्ययन पद्वति:

प्रस्तुत अध्ययन बस्तर के मुरिया जनजाति के तत्वदृष्टि एवं जीवनदृष्टि से जुड़े सांसकृतिक तत्वों को ज्ञात करने के लिए नारायणपुर जिला के 03 उत्तरदाताओं का चुनाव किया गया है उद्वेश्यपूर्ण निदर्शन के द्वारा किया गया है चयनित उत्तरदाता में क्रमशः 02 पुरूष और एक महिला है जिसमें 01 पुरूष लगभग 73 वर्ष दूसरा 54 वर्ष तथा महिला उत्तरदाता की आयु 67 वर्ष आयु की है चयनित तीनों उत्तरदात पृथक-पृथक गांव के है। उत्तरदाताओं से साक्षात्कार-निर्देशिका के द्वारा किया गया है।

 

उत्तरदाताओं की दैनिक दिनचार्या:

उत्तरदाताओं से दैनिक दिनचर्या कैसे व्यतीत करने के संबंध में चर्चा करने पर ज्ञात हुआ कि एक सामान्य मुरिया जनजाति प्रमुख चार प्रकार के पारंपरिक गतिविधि है जिसमें पूरे वर्ष भर की समय अवधि को गुजारती है जिसमें उन्होंने बताया कि कृषि कार्य, वनोपज संग्रहण, तीज-तैयोहार एवं सांस्कृतिक क्रियाकर्म प्रमुख बताया गया है।

 

 

कृषि कार्य:

मुरिया जनजाति अपने दैनिक दिचर्या कृषि एवं वनोपज संग्रहण के द्वारा सामान्यतः जीविका करती रही है। कृषि एवं आर्थिक क्रिया कलापों में तत्वदृष्टि एवं जीवन दृष्टि को यहां देखने का प्रयास किया गया है।

 

फसल बोई का अनुष्ठान :

मुरिया जनजाति को लोगों द्वारा मई माह के अतिम सप्ताह और जून माह में वर्षा आने की सूचना तितली के किसी ऐक ही दिशा में तेजी उड़ रहा हो दूसरा यह बताया गया कि एक प्रकार का किट ( दिमक का परिवर्तित रूप ) उपर बड़ी तादाद् में उड़ने पर निकट समय या दिनों बारिस होने का अनुमान लगाया जाता है तथा फसल बुवाई की तैयारी प्रारंभ की जाती है तैयारी के इन अवसरों पर माटी पूजा किया जाता है पूजा में: मुर्गा, बकरा एवं सुवर की बली चढ़ायी जाती है। पूजा का उद्वेश्य: 1. बीज से स्वस्थ पौधा उगे, 2. फसल पैदावर एवं लाभकारी हो। 

 

हरियाली पर्व:

सितंबर- अक्टूकर माह में फसल लहलहाती खेत में एक जीवन दृष्टि दिखाई पड़ता है जिसमें तेदू वृक्ष के छोटा सीधा डगाल के उपरी हिस्सा को व्ही आकार का काटकर उसमें भलवा पत्ता रसना बेल से बांधकर गाड़ते है इसके पीछे जनजाति दृष्टि दृष्टि यह है कि - प्रथम, फसल में किसी का बुरा नजर लगे, द्वितीय, फसल में किड़ा लगे एवं तीसरा अच्छी पैदावार मिलेगी। नवा खाई पर्व इसी तत्व दृष्टि का परिणाम होती है जिसमें जनजाति परिवार ग्राम देवता एवं कुल देवता को अर्पण की पूजा करता है तथा नया फसल चावल को चड़ाया जाता है,,नया चावल को कुरई के पत्ता में चड़ाते है एवं तीन माह तक इसी पत्ता में भोजन करना बतला गया गया

       

खलिहान में पूजा:

उत्तरदाताओं के अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि मुरिया जनजाति खलिहान (जहां धान की मिजांई की जाती है ) में फसल मिंजाई करने के प्रारंभ होने के एक दिन पूर्व संध्या में मुर्गी के आण्ड को रखती है जो मिंजाई समाप्त होते तक रहती है एक प्रकार का तत्व दृष्टि है, जिसका संबंध कोठार देव की पूजा करने से है इसके परिणामस्वरूप-खलिहान में फसल को किसी प्रकार की हानी नहीं होती तथा मिजांई कर सुरक्षित घर के  कोठा तक पहंुच पाता है।

 

धन की माईसिदो“:

उत्तरदाताओं के अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि मुरिया जनजाति के संपन्न परिवारों में उनके परिवार धन दौलत की दृष्टि से संपन्न होने के पीछे मूल कारण सिदों माई को बताया गया सिदो जिस किसी परिवार में होती है परिवार में धन कमी नहीं होने देती सिदों के संबंध में उत्तरदाताओं द्वारा बताया गया कि यह 4-7 साल की लड़की या काली बिल्ली के वेश कभी कभार संपन्न पिरवार में दिखायी पड़ती है। सिदो के पीछे मान्यताएं की जब तक उसकी परिवार में मान-सम्मान होती रहती है तब तक परिवार को आर्थिक लाभ खासकर अनाज की कमी नहीं होने देती है। उत्तरदाताओं से इस बात को ज्ञात करने का प्रयास किया गया कि परिवार में सिदों सामान्यतः किन कक्ष रहती है-उन्होंने बताया कि सिदों कोठा जहा ढोलंगी में रखा जाता है वहां सिदों को चारों ओर ढोलंगी से घेरकर रस्सी से बांध देती है इसी ढोलंगी के बीच सिदो का निवास बताया गया है।

 

सिदों की पूजा दो अवसरों पर किया जाता है प्रथम, नई फसल घर लाने के बाद और दूसरा परिवार में विवाह या बड़े आयोजन होने के बाद। प्रथम अवसर पर पूजा में एक तरह का सिदो को धन्यवाद ज्ञापित किया जाता और कहा जाता है कि - “ परिवार में धन जुटाने तेरा की कार्य है, तेरा परिवार मान-सम्मान हो, तेरा ही कृपा दृष्टि है, तेरे ही मेहनत से ढोलंगी भरे है, आने वाले वर्षो में धन जुटाने के लिए तू ही जिम्मेदार है आदि.....दूसरा अवसर पर सिदों की पूजा इस लिए की जाती है कि परिवार में बढ़े आयोजनों से परिवार अशुद्व हो जाती है इससे सिदों अन्यत्र किसी परिवार में भाग जाने की भय होती है। सिदो परिवार बनी रहे इसके लिए परिवार की सुधीकरण के लिए सिदो की पूजा की जाती है। इस प्रकार जनजाति परिवार में किसी परिवार का अधिकाधिक धनाडय होने सिदों होने का अनुमान लगाया जाता है। सिदो का कार्य 1.) परिवार में विभिन्न प्रकारी की अनाजों की कमी नहीं होने देती है, 2.)परिवार में धन की कमी हो इसके लिए वह दूसरे परिवार के धन को चुराकर लाने का कार्य भी करती है, 3.) अनाज रखने के बर्तन, खाना पकाने के बर्तन आदि में अनाज जोजन वस्तु बना रहता है। इसी कारण सम्पन्न परिवार में बासी भात (पूरा तैयार भोजन) पूरा 365 दिन खाते है।

 

मकान निर्माण में तत्वदृष्टि:

उत्तरदाताओं से मकान निर्माण में किस प्रकार स्थल का चुनाव किया जाता है ज्ञात करने का प्रयास किया गया उत्तरदाताओं से चर्चा से ज्ञात हुआ कि मकान निर्माण किए जाने वाले स्थान में चारों कोनो में अरवा चावल के कुछ निश्चित दाने शाम को डाल देते है सुबह जाकर देखते है की चावल उतनी ही मात्रा में है अथवा नहीं ? यदि चावल उतनी ही मात्रा में है तो उस स्थान में मकान बनाना लाभकारी होगा और यदि दाना कम हो तो यह स्थान भवन बनाने लायक नहीं। यही कारण है कि जनजाति परिवार का सामान्यतः अपने निवास स्थान को छोड़ना नहीं चाहता है

 

कुंआ खुदाई में तत्वदृष्टि:

उत्तरदाताओं से इस बात को ज्ञात करने का प्रयास किया गया कि उनके द्वारा कुंआ खुदायी के लिए स्थान का चुनाव कैसे किया जाता है उनके द्वारा बताया गया कि-1.) एक जाम के लकड़ी से हथेली रखते जहां पानी का स्त्रोत होगा वहां हाथ में लकडी खड़ा होने पर यह स्वीकार किया जाता है कि यहां जल का स्त्रोत अच्छा है एवं 2.) दूसरा विधि अनुसार नारियल से भी जल स्त्रो को देखा जाना बताया गया।

 

वनोपज एवं शिकार:

मुरिया जनजाति के जीविका एक प्रमुख साधन वनोपत रहा है वनोपज से वह जीवन के आवश्यकताओं की पूर्ति  करता है यही कारण है कि वनोपज और शिकार उनके जीवन का एक हिस्सा है इस अवसर पर समुदाय के मान्यताओं के अुनसार कई क्रियाकर्मो को सम्पन्न करती है -

 

1.         पेड़ो को आदर एवं सम्मान करना:

जनजाति प्रकृति पे्रमी होती है उत्तरदाताओं से ज्ञात हुआ कि मुरिया जनजाति के 750 पेड़ ऐसे है जिसका संबंध गोत्र से है अर्थात प्रत्येक गोत्र के पीछे एक पेड़ आता है जैसे कच्छुआ गोत्र के लोग कस पेड़ का संमान करते है और इसको हानी नहीं पहुंचाते हैै।  अन्य वृक्षों में जैसे- सल्फी, ताड़, महुआ, आम, साजा, धांवरा, साल, चारडूमर, कुसूम, कुल्लू, नींबू, नीम, केला, अमरूद, गूलर, तेंदू इत्यादि है। इसके अतिरिक्त जड़ी-बूटि संकलित करके आय से जीविका चलाते है।

 

2.         शिकार करने जाने एवं वापस आने में तत्व दृष्टिः

उत्तरदाताओं के संपर्क करने से ज्ञात हुआ कि मुरिया जनजातियों में शिकार पर जाने से पहलेवीर पूजाकिया जाता है तथा जंगल में प्रवेश करने से पहलेसेसा-मानकिया जाता है जिसमें - एक अण्डा, लाली (सिन्दुर), कोयला को पीसकर और जला मिट्टी को पीस कर चढ़या जाता है इसके पश्चात वनो में शिकार के लिए प्रवेश किया जाता है वर्तमान में यह परम्परा नक्सली समस्या एवं नई वन नीति के फलस्वरूप परिवर्तन हो रहा है। शिकार करके वापस आना  मारा गया शिकार ढोकर लाने का दायित्वपद्दा टोण्डा ”(जो गांव की एक प्रकार का पद है।) जो शिकार को ढोकर लाने का कार्य करता है। इस बीच साथ के शिकारी गाना गाते हुए साथ में चलते है और गांव पहुंचते है गांव के महिलाए अन्यों द्वारा स्वागत किया जाता जिससेमाटी गायताकहते है  

 

बच्चा जन्म के उत्सव:

बच्चा के जन्म लेने से मुरिया जनजाति में अन्य समुदायों की तरह खुसी जाहिर किया  जाता है। इस अवसर पर गुरिया जनजाति के प्रत्येक गोत्र के अपने-अपने गोत्र समूह के देवी देवताओं की पूजा करते है ? इन देवों मेंतलुर मुत्तेदेवी और बुढ़ देव की पूजा की जाती है   इस अवसर के पूजा एवं चड़ावा में लांदा (राइस बीयर), महुआ का शराब आदि चड़ाया जाता है। पूजा करने का उद्वेश्य 1.) नवजात बच्चा की सुख-शांति के लिए एवं 2.) परिवार की संमृद्वि के लिए तथा प्रसव शीघ्र हो इसके लिए गर्भवती के कमर में जड़ी-बुटी बांधा कर प्रसव कराया जाना बताया गया  

 

विवाह कार्यक्रम जुड़े तत्वदृष्टि:

उत्तरदाताओं से ज्ञात हुआ कि विवाह संबंध जोड़ने में आज भी आधे से अधिक परिवार पारम्परिक रूप से विवाह करते है रिस्ता जोड़ने का कार्य माता-पिता, मामा-मामी, फुफा-फूफी एवं मौसा-मौसी के द्वारा रिस्ता जोड़ने का कार्य किय जाता है। वर्तमान में इसमें धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहे है।

 

रिस्ता पक्का होने सूचना जब किसी परिवार रिस्ता लेकर लड़की देखने जाते है उस समय साथ में महुआ शराब लेकर जाता है और लड़की एवं माता-पिता विवाह के लिए सहमत होने पर लड़के पक्ष से लिया गया शराब पीना प्रारम्भ करते इससे लोग देखकर समझ जाते है कि रिस्त तय हो चुका है उत्तरदाता द्वारा बतलाया गया कि वर वधु की आयु 14-20 वर्ष के आयु समूह को विवाह के उपयुक्त आयु माना जाता है। नवविवाहित अधिकांश लड़कियां 14-17 तक की आयु के दिखायी देते है मुरिया जनजाति पर हाल में किए एक (रात्रे प्रमिलाः 2017) अध्ययन जिसमें 290 परिवार का अध्ययन किया गया जिसमें 48 प्रतिशत विवाहित महिलाओं की आयु 16 वर्ष से कम आयु के पाये गये है। इस आयु समूह को विवाह के लिए योग्य मानने का आधार -1.) लड़कियों के मासिक धर्म प्रारम्भ हो चुका हो, 2.) इस घटना क्रम से घर के देखभाल करने में सक्षम मानना एवं 3.) घोटूल में भागीदारी करने से समुदाय के क्रियाकर्मो की पर्याप्त जानकारी होने की बात बतलाया गया था। वधु तलाशना के कार्य में तीन नातेदारों की भूमिका बताया गया- 1.) मामा-मामी के लड़का/लड़की, 2.) फुफा-फुफी के लड़का/लड़की एवं 3.) मौसा-मौासी के लड़का/ लड़की। मुरियाओं में इन नातेदारों से वैवाहिक संबंध जोड़ना एक तरह से अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है

 

मुरिया जनजाति प्रचलित विावाह छः प्रकार का बतलाया गया है- 1.) अविताना: इस विवाह लड़के लड़की के पसंद से किया जाता है, 2.) हईवक वट: इस विवाह लड़की लड़के के घर जबरन जाकर रहती है। अंत विवाह कर दिया जाता है, 3.) टिकस टासना: यह समाज के विधवा महिलाओं का विवाह है, 4.) दोसाना मारमी: यह विवाह एक तरह का प्रेम विवाह है जिसके संबंध में विवाह के पूर्व ही समुदाय के लोगों को एक दूसरे को पसंद करने और शारीरिक संबंध होने के आधार पर विवाह कर दिया जाता है, 5.) ओस्तासाना मारमी: यह मुरिया जनजाति का परम्परागत विवाह है जिसमें हल्दी लेपन के बाद वधु वर के घर लेजाकर विवाह के पूरा कार्यक्रम संपन्न किया जाता है एवं  6.) दुध लौजाई: यह विवाह इसके पूर्व में किए विवाह पर नियंत्रित होती है जैसे - किसी परिवार बेटा के लिए मामा की  लड़की विवाह करके बहू बनाया गया है तो इस परिवार एक जिम्मेदारी गयी है कि मामा के घर में एक बेटी देना होगा और अवसर आने पर मामा के छोटा बेटा के लिए बेटी विवाह के द्वारा लिदा जाता है जिसेदुध लौटाईकहा जाता है। दूध लौटाई के पीछे कारण - 1.) अपने परिवार की रक्त की शुद्वता बने रहना, 2.) नाते-रिस्तेदार होने से आपसी प्रेम-संबंध मजबुत बने रहना, 3.) वंश के विकास एवं निरन्तरता को बनाये रखने में सहायक होना एवं 4.) धार्मिक एवं संस्कृति मूल्यों को क्रियान्वयन एवं स्थायीत्व बनाये रखने में सहायक होना बताया गया।

 

विवाह नेग का प्रचलन के संबंध में उन्होंने बतलाया कि -वर पक्ष द्वारा वधु पक्ष को दिए जाने वाली सामग्रियों में सामान्यतः महुआ शराब, महुआ, महुआ बीज (टोरा या डोरी), सल्फी, ल्ंादा, वनोपज संग्रहित वस्तुएॅ, जानवर तथा चूड़ा, गुड, नारियल दिया जाता है।

 

घोटुल और तत्वदृष्टि:

उत्तरदाताओं के अध्ययन से घोटूल के संबंध में ज्ञात हुआ कि घोटूल मुरिया जनजाति के युवाओं का युवा गृह है जहां सामाजिक एवं सांस्कृति गतिविधियों को संचालित करने की जानकारी युवाओं को दिया जाता है। घोटूल एक तरह का उरांव जनजाति के घुमकुरिया के सामान ही एक संस्था होती है। अध्ययन से घोटूल निम्न कार्य बतलाया गया- 1.) गांव के वैवाहिक कार्यो में सहयोग करना, 2.) गांव के किसी परिवार के मकान, आर्थिक कार्य, अधोसंरचना निर्माण कार्य में सहयोग 3.) सांस्कुतिक नाच गान आयोजन , तथा 4.) लड़का लड़की के लिए योग्य जीवन साथी का तलाश करना और इस संबंध में परिवार को निर्देषित और सूचना देने का कार्य मोहन्ती एच.पी. ( ”इन इमपेथी वीथ ट्राइबल इथोस ”: 1988) ने अपने अध्ययन कोरापुट ओरिसा परजा जनजाति पर आधारित है जिसमें धनगड़स एवं धनगड़ीस  युवक एवं युवतियों की एक संस्था जिसको उन्होंने डारमेट्री कहा है। कुछ इसी तरह का कार्य रायबहादुर शरतचन्द्र राय (1997) के अध्ययन में भी देखने को मिलता है आपके अनुसार घोटूल 1.) युवागृह भोजन इकट्ठा करने के कार्य में एक महत्वपूर्ण आर्थिक संगठन के रूप में कार्य करते है, 2.) यह युवको तथा युवतियों को सामाजिक तथा अन्य प्रकार के कर्तव्यो की शिक्षा देने का एक उपयोगी केन्द्र है तथा 3.) यह जादू और धर्म से सम्बन्धित संस्कारों को करने सिखाने का स्थान है जिससे जैसा इनमे विश्वास है, शिकार मे सफलता प्राप्त होगी और युवको की उत्पादन शक्ति मे वृ़िद्ध करने का उल्लेख किया है।

 

गोदना से जुड़े तत्वदृष्टि:

मुरिया जनजाति में गोदना विवाह प्रतिमान का एक हिस्सा है और यदि किसी कन्या द्वारा गोदना नहीं कराई है तो विवाह के समय जुर्मना लागाया जाता है तथा जुर्मना राशि विसम संख्या में, न्यूनतम 3.00 रूपये से प्रारम्भ होती है। गोदना के पीछे मान्यता - 1.) गेदना महिलाओं की श्रृगार के रूप में देखा जाता है, 2.) मुरिया जनजाति की मान्यता अनुसार गोदना की उसे स्वर्ग तक ले जाती है बतलाया गया।

 

मृत्यु क्रिया कर्म की मान्यताएं:

उत्तरदाताओं के मृत्यं क्रियाकर्म के संबंध में ज्ञात करने का प्रयास किया गया जिसमें पाया गया कि मुरिया जनजाति में मृत शरीर को दो प्रकार से अंतिक क्रियाकर्म किया जाता है- 1.) सामान्य मृत्यु होने पर दफनाया जाता है एवं 2.) बड़ी बीमारी जैसे टीवी या कैसर जैसे बीमारी से मृत्यु होने से जलाया जाता है। दोनों ही प्रक्रिया में मृत व्यक्ति के नाम से पत्थर का खम्भा गाड़ा जाता है जिसेउर्स कलफकहा जाता है जिसका  अर्थगड़ा हुआ पत्थरहै, यह तथ्य एल्विन वेरियर (1947)7 “ मुरिया एण्ड देयर घोटुल“: पृ 161) के अध्ययन में भी पाया गया है तथा वर्ष में एक बार दीपक जलाया जाता है। पत्थर गाड़ने के पीछे दो कारण बताया गया- 1.) स्मृति के लिए एवं 2.) दो -तीन पीढ़ी तक वंशज की जानकारी के लिए। इनमें मृत्यु भोज का चलन है जिसमें साकाहारी एवं माशाहारी दोनों ही प्रकार के भोजन का चलन होना बतलाया गया।

 

 

 

 

 

 

मुरिया जनजाति के त्यौहार:

मुरिया जनजाति निम्न तीज त्यौहार मनाएं जाते है -

क्रमांक  तीज-त्यौहार     माह      अवसर

1.         विज्जा पंडुण्म   अप्रैल   1 धान के बीज बोने से पहले धरती

  माता को धन्यवाद देने के लिए

2 शिकार पर जाने से पहले अच्छे

  शिकार की प्राप्ति हेतु

2.         आमा पंडुण्म     मई       एक साल में पहली बार आम खाने से पहले भगवान की पूजा

3.         पाने पंडुम         मई       धान के बीज बोने से पहले

4.         दिला पंडुम        जून      हल से संबंधिक कार्य खत्म होने पर

5.         टमूस    अगस्त धान की बुवाई के पूरा होने के बाद

6.         पोदल पंडुम       अगस्त फसल को सभी बीमारियों से बचाने के लिए

7.         चिकमा सिंतम्बर           सब्जियों की नयी फसल खाना शुरू करने से पहले

8.         कारता  अक्टूबर            नए चावल खाना शुरू करने से पहले

9.         पाने पंडुण्म       नवम्बर            फसलों की प्राप्ति के लिए धन्यवाद

10.       गादी पंडुण्म      फरवरी  महुआ फूलों को उठाने से पहले

स्त्रोत: उत्तरदाताओं बताये तथ्यों के आधार पर

 

 

दीवार चित्रकारी:

उत्तरदाताओं के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि मुरिया समुदाय में विशेष अवसरों में दीवरों में विभिन्न प्रकार के चित्र उकेरा जाता है इसका  मूल महत्व इसे मुरिय मंगल सूचक मानना और चित्र द्वारा देवी देवताओं को धन्यवाद दिया जाना बतलाया गया।

 

भय का समय:

मुरिया जनजाति के अनुसार कार्तिक आमावश्य रात भय का माना जाता है मान्यता के अनुसार पिशाच, शैतान रात को घुमते है। इससे बचने के लिए मुरिया परिवार में एक तो सोते समय नमक लेकर सोते है दूसरा दरवाजे के बाहर कोयला और जला हुआ मिटटी से रेखा खीजा जाता है और परिवार की सुरक्षा किया जाता है। 

 

निष्कर्ष:

उपरोक्त विश्लेषण से ज्ञात होता है कि मुरिया जनजाति के दैनिक जीवन में तत्वदृष्टि आज भी देखने को मिलता है और इन्हीं तत्वदृष्टि से निर्देषि होने वह अपने दैनिक जीवन कई प्रकार के गतिविधियों को करता है। यही तत्तवदृष्टि जिसका संबंध सांस्कृतिक प्रतिमानों से है जो जनजातियों को विभिन्न अवसरो  के क्रियाकर्मो को सम्पन्न करने के लिए प्रेरित करता है। मुरिया जनजातीय जीवन में पारंपरिक मान्यताओं एवं विभिन्न प्रकार क्रिया-कर्म इन्हीं तत्वदृष्टि से संचालित होते परिणामस्वरूप जनजातियों में परंपराओं अपेक्षाकृत स्थिरता अधिक देखने को मिलता है। यहां बाहरी लोगों के दबाव बढ़ने से इनके तत्वदृष्टि पर प्रतिकूल प्रभाव दिखाई देने लगा है और इनके सांस्कृतिक गतिविधियां एवं पारंपरिक मान्यताओं को पूर्ण करने रूकावट पैदा कर रही है इससे मुरिया जनजाति प्राचीनतम् धरोहर घोटूल जैसे संस्थान संकट में आकर समाप्त होने के कगार पर गये है। सांस्कृति पतन इनमें अलगाव, पलायन, अपराध जैसे लक्षणों को वृद्वि हो रहे है। वास्तव में यदि मुरिया जनजाति पर बाहरी समाज के दबाव ऐसे ही बढ़ता रहा तो जनजाति संस्कृति जिस प्रकार अमेरिकी जनजाति संस्कृति समाप्त हो गये वैसे ही मुरिया तत्वदृष्टि और जीवन दृष्टि भी इतिहास में तबदील हो जाएगें

 

संदर्भ सूची:

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Received on 05.07.2018                Modified on 11.08.2018

Accepted on 05.09.2018            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(3):366-372.